Uttarakhand Famous Fair's ( Part 1)

  1. गौचर मेला (Gauchar mela)- गौचर (चमोली जिले में) पंडित जवाहर लाल नेहरु के जन्मदिन (14 November) से शुरू होता है। प्रथम बार यह 1943 में मनाया गया।
  2. माघ मेला (Magh Mela)उत्तरकाशी (UttarKashi) इस मेले का प्रतिवर्ष मकर संक्राति के दिन पाटा-संग्राली गांवों से कंडार देवता के साथ -साथ अन्य देवी देवताओं की डोलियों का उत्तरकाशी पहुंचने पर शुभारम्भ होता है। यह मेला 14 जनवरी मकर संक्राति से प्रारम्भ हो 21 जनवरी तक चलता है। इस मेले में जनपद के दूर दराज से धार्मिक प्रवृत्ति के लोग जहाँ गंगा स्नान के लिये आते हैं।
  3. चैती मेला (Chaiti Mela) - नैनीताल जनपद में काशीपुर नगर के पास प्रतिवर्ष चैत की नवरात्रि में आयोजित किया जाता है।
  4. बग्वाल : देवीधुरा मेला (चम्पावत) -हर वर्ष रक्षा बंधन के अवसर पर पर श्रावणी पूर्णिमा को माँ बाराही मंदिर परिसर में देवीधुरा मेले का आयोजन होता है। इस मेले में पत्थरों की वर्षा (पत्थर युद्ध) होता है जो इसे विशेष बनाता है। इस पत्थरमार युद्ध को स्थानीय भाषा में बग्वालकहा जाता है। यह बग्वाल कुमाऊँ की संस्कृति का अभिन्न अंग है। प्राचीन काल से चली आ रही यहाँ की एक स्थापित परंपरा के अनुसार माँ बाराही धाम में श्रावणी पूणिमा (रक्षाबंधन के दिन) को यहाँ के स्थानीय लोग (जिन्हे खाम कहा जाता है, क्रमशः चम्याल खाम, बालिक खाम, लमगडिया खाम, और गडहवाल,) दो समूहों में बंट जाते हैं और इसके बाद होता है एक युद्ध जो पत्थरों को अस्त्र के रूप में उपयोग करते हुये खेला जाता है। बग्वालएक तरह का पाषाण युद्ध है जिसको देखने देश के कोने-कोने से दर्शनार्थी इस पाषाण युद्ध में चार खानों के दो दल एक दूसरे के ऊपर पत्थर बरसाते है बग्वाल खेलने वाले अपने साथ बांस के बने फर्रे पत्थरों को रोकने के लिए रखते हैं। मान्यता है कि बग्वाल खेलने वाला व्यक्ति यदि पूर्णरूप से शुद्ध व पवित्रता रखता है तो उसे पत्थरों की चोट नहीं लगती है। सांस्कृतिक प्रेमियों के परम्परागत लोक संस्कृति के दर्शन भी इस मेले के दौरान होते हैं। यह मेला प्रति वर्ष रक्षा बंधन के अवसर पर 15 दिनों के लिए आयोजित किया जाता है जिसमें अपार जन समूह दर्शनार्थ पहुंचता है।
    लोक कथा
    वैष्णवी माँ वाराही का मन्दिर भारत में गिने चुने मन्दिरों में से है। पौराणिक कथाओं के आधार पर हिरणाक्ष व अधर्मराज पॄथ्वी को पाताल लोक ले जाते हैं। तो पृथ्वी की करूण पुकार सुनकर भगवान विष्णु वाराह का रूप धारण कर पृथ्वी को बचाते है। तथा उसे वामन में धारण करते है। तब से पृथ्वी स्वरूप वैष्णवी वाराही कहलायी गई। यह वैष्णवी आदि काल से गुफा गहवर में भक्त जनों की मनोकामना पूर्ण करती आ रही है।
    इस मेले को बग्वाल, देवीधुरा मेला, पाषाण युद्ध मेला के नाम से जाना जाता है।
  5. सयाळे बिखौती मेला (Shyalde-Vikhauti mela) अल्मोड़ा जनपद के द्वाराहाट कस्बे में सम्पन्न होने वाला स्याल्दे बिखौती का प्रसिद्ध मेला प्रतिवर्ष वैशाख माह में सम्पन्न होता है । हिन्दू नव संवत्सर की शुरुआत ही के साथ इस मेले की भी शुरुआत होती है जो चैत्र मास की अन्तिम तिथि से शुरु होता है । यह मेला द्वाराहाट से आठ कि.मी. दूर प्रसिद्ध शिव मंदिर विभाण्डेश्वर में लगता है । मेला दो भागों में लगता है । पहला चैत्र मास की अन्तिम तिथि को विभाण्डेश्वर मंदिर में तथा दूसरा वैशाख माह की पहली तिथि को द्वाराहाट बाजार में । मेले की तैयारियाँ गाँव-गाँव में एक महीने पहले से शुरु हो जाती हैं । चैत्र की फूलदेई संक्रान्ति से मेले के लिए वातावरण तैयार होना शुरु होता है । गाँव के प्रधान के घर में झोड़ों का गायन प्रारम्भ हो जाता है।
    चैत्र मास की अन्तिम रात्रि को विभाण्डेश्वर में इस क्षेत्र के तीन धड़ों या आलों के लोग एकत्र होते हैं । विभिन्न गाँवों के लोग अपने-अपने ध्वज सहित इनमें रास्ते में मिलते जाते हैं । मार्ग परम्परागत रुप से निश्चित है । घुप्प अंधेरी रात में ऊँची-ऊँची पर्वतमालाओं से मशालों के सहारे स्थानीय नर्तकों की टोलियाँ बढ़ती आती है इस मेले में भाग लेने । स्नान करने के बाद पहले से निर्धारित स्थान पर नर्तकों की टोलियाँ इस मेले को सजीव करने के लिए जुट जाती है ।
    विषुवत् संक्रान्ति ही बिखौती नाम से जानी जाती है । इस दिन स्नान का विशेष महत्व है । मान्यता है कि जो उत्तरायणी पर नहीं नहा सकते, कुम्भ स्नान के लिए नहीं जा सकते उनके लिए इस दिन स्नान करने से विषों का प्रकोप नहीं रहता । अल्मोड़ा जनपद के पाली पछाऊँ क्षेत्र का यह एक प्रसिद्ध मेला है, इस क्षेत्र के लोग मेले में विशेष रुप से भाग लेते हैं ।
  6. कठ्बददी मेला
    • खिर्सू ब्लॉक के ग्वाड गॉव में आयोजित होता है।
    • यह मेला हर बैसाख माह के तीसरे सोमवार को आयोजित किया जाता है।
    • यह मेला एक साल कोठ्गी और दुसरे साल ग्वाड गॉंव में आयोजित होता है।
    • पहले मनोरंजन के लिए मेला आयोजित किया जाता था. जिसमे बद्दी (गीत गाने वाला ) को रस्सी के सहारे खिसकाया जाता था. यदि वह रस्सी के अंत तक पहुच जाये तो उसे धन दिया जाता था। अब बद्दी की जगह बुरांस की लकड़ी को तराश कर उसे मानवाकार दिया जाता है और उसे रस्सी की सहारे खिसकाया जाता है।

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